
ग्राम छागोला का सामाजिक-सांस्कृतिक एटलस
गाँव की पहचान, लोक इतिहास, प्रकृति, जल-संरचना और पारंपरिक भील सामाजिक व्यवस्था का संकलन।
गाँव के नाम की कहानी
छागोला गाँव का नामकरण यहाँ की ऐतिहासिक घाटी और छांवदार वनों के आधार पर माना जाता है। बुजुर्गों के अनुसार पुराने समय में यह क्षेत्र सघन पेड़ों और शीतल जलस्रोतों से समृद्ध था।
गाँव का इतिहास एवं बसाहट
छागोला गाँव भील समुदाय के प्रमुख कुलों द्वारा कई पीढ़ियों पूर्व बसाया गया था। यहाँ के तड़वी और बड़वा परंपरा से गाँव के आपसी विवादों और सामाजिक कार्यक्रमों का संचालन करते हैं।
नदी, तालाब, पहाड़ और जलस्रोत
गाँव से होकर बहने वाले प्राकृतिक नाले और शिवगंगा द्वारा हलमा के माध्यम से बनाए गए चेकडैम व तलाई गाँव में भूजल स्तर को समृद्ध रखते हैं।
पेड़-पौधे, पशु और वनस्पतियाँ
गाँव में महुआ, पलाश (खाखरा), नीम, सागौन और बाँस के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं। गाय, बैल, बकरी और देशी मुर्गी पालन मुख्य आजीविका के सहायक साधन हैं।
खेती और चराई की जगहें
गाँव की सामूहिक गोचर भूमि (माल भूमि) पशुओं के चरने और सामुदायिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी जाती है।
पारंपरिक व्यवस्था एवं पंचायत
तड़वी (गाँव का मुखिया), बड़वा (परंपरागत स्वास्थ्य और अनुष्ठान विशेषज्ञ), और कोटवाल की सामूहिक व्यवस्था से गाँव चलता है।
परंपराएँ, पर्व और त्योहार
भगोरिया, जात्रा, दिवसो, नवाई, और हलमा यहाँ के प्रमुख पर्व व परंपराएँ हैं।
जानकारी संकलन: ग्रामगुरुकुल शोध दल एवं छागोला ग्रामवासी
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